Saturday, 16 May 2020
टिक टॉक के बीमार
Saturday, 9 May 2020
प्राकृतिक विध्वंस
Monday, 4 May 2020
धनी और दानी
Tuesday, 14 April 2020
देश के जयचन्द
Monday, 30 March 2020
क्यों नही सीखते इतिहास से
Sunday, 22 March 2020
माँ का आँचल
कैसी अजब है ये बात कि संताने समझने लगती हैं ,
बुजुर्गो को खुद पर बोझ।
एक बात समझलो ऐ नादानों,
इस जीवन में हो तुम उनके आलोक।
बुलंदियों को छूने की चाह मन में आई थी,
साथ दिया उस माता ने जो आज तुझे न
भाई थी।
जब काल तेरा आएगा ,
न रोएगी दुनिया तुझ पर।
वही माँ फिर भी तुझे,
अपने आँचल में सुलयेगी।।
धन्यवाद (तरुण त्यागी)
Thursday, 12 September 2019
बस यही गाऊँ
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ
लब खुलें जब भी बस मैं यही गाऊँ
के जो अपना निशान-ओ-लहू बहाते हैं
वे जो जिस्मों को अपने यूँ ही तपाते हैं
वे जो सरहद पर हरपल एक कहानी हैं
किसने ये उनकी ताकत न पहचानी है
वे जो रोके हैं गोली को अपने सीने से
वो वंचित हैं बहनों की राखी-रोली से
उनको मैं नत्मस्तक हो प्रणाम करता हूँ
उनके चरणों मे मैं ये पैगाम रखता हूँ
के न कुर्बानी तुम्हारी यूँही जाया होगी
अगली पीढ़ी से तुम्हारी यादें ताज़ा होंगी
मैं तो हर पल बस यही दोहराऊं
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ
होती होगी तकलीफ उन माताओं को
खलती होगी कमियां भी उनके गांवों को
लहलहाती फसलों और ठंडी छांव को
थोड़ी यादें उनको भी तो झटकाती होंगी
घर की यादें उनको भी तो आती होंगी
फिर भी चलते हैं वो सीने में एक चिंगार लिए
कंधों पर अपने देश की सुरक्षा का भार लिए
लब खुलें जब भी मैं बस यही गाऊँ
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ।