Saturday, 16 May 2020

टिक टॉक के बीमार

कोई सोलह वर्ष की आयु में कुछ सपने सजाये बैठे हैं
फौजी बनकर सरहद पर जाने की आस लगाये बैठे हैं
जी तोड़ कोशिश महनत करके वे लोहे से तैयार हैं
वहीं एक और कुछ नौजवान  टिक टॉक से बीमार हैं

कोरोना से तो लड़ ही लेंगे इसमें कोई भेद नहीं
पर नस्लों को डूबे देखूं तो कैसे कहदूँ मुझे खेद नहीं
खेद भी है और डर भी भीतर के अब भी जो ये ना जागे
तो इनका भविष्य बनाने को क्यों कोई इनके पीछे भागे

जन नायक कहते हैं हमको आत्मनिर्भर बनना होगा
पर मैं  कहता हूं पहले राष्ट्र को समझदार बनना होगा
कोई आकर सही गलत का भेद हमें क्यों बतलाये
क्यों न स्वयं नव पीढ़ी भारत को उचित मार्ग पर ले जाये

कला और कौशल दोनो का मैं भी करता सम्मान हूँ
पर टिक टॉक वाली कौम से मैं थोड़ा हैरान हूँ
है लग्न तुममे गाने की या अभिनय का है कौशल
तो टिक टॉक से बाहर आकर करो अपना उद्देश्य सफल

Saturday, 9 May 2020

प्राकृतिक विध्वंस

वर्षों से जो था हो न सका
वह सब सम्भव हो पाया है
खुद को संरक्षित करने को 
प्रकृति ने विध्वंस मचाया है

थे चीख उठे धरती - अम्बर
थे चीख उठे भूतल - सागर
जो मलिन हुए थे वर्षों तक 
हैं पुनः खिले नव जीवन पाकर

यह भी हम सब न भूलें 
की आज समय जो आया है
कितना घातक होता परिणाम 
प्रकृति ने हमें बताया है

ब्रम्हा ने सृष्टि रचना की
और दिया व्याप्त भोजन साधन
फिर मानुस भूख मिटाने को
क्यों करता जीवों का भक्षण

जब जब भी मनुष्य जाति ने
खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखलाया है
प्रकृति ने घमण्ड मिटाने को 
तब तब विध्वंश मचाया है

यह आज विपद जो आयी है
चहुँ और शांति सी छाई है
इस विपदा से लड़ते लड़ते 
लाखों ने जान गंवाई है

कल भले हमें उपचार मिले
इतना तब भी पर ज्ञात रहे
अपनी सभ्यता बचानी हो
तो प्रकृति से न खिलवाड़ करें

Monday, 4 May 2020

धनी और दानी

कौन कहता है कि जग में धन से बड़ा कुछ भी नहीं
मौज में रहें अमीर सदा ही ये भी तो मुमकिन नहीं
धन नहीं है पास जिनके है घमण्ड उनमें नहीं
अहम का एक मात्र कारण अब कहीं धन तो नहीं

और है अगर धन भी भरा हो कहीं तेरे भंडार में
रहना तू हर दम हमेशा ही निर्धनों के उद्धार में
मिलती नहीं वसिहतों में सदा दौलतें भंडार में
वसीहत में मिलते हैं कभी संस्कार भी संसार में

धन के सत्ता के मद में हों जो उनका क्या उपचार हो
नहीं दिखा पाते अधिक समय तक शान वें संसार को
हो सरल जो और निश्छल और हो दानी बड़ा
यद्यपि ही ईश्वर भी सदा संग ही उनके खड़ा

हो अगर सक्षम तुम इतने और हो धनवान भी
दो तो भूखों को रोटी और रोतों को मुस्कान भी
शान से तुम भी खिलोगे महकोगे हर शाम ही
और इसी व्यक्तित्व को सराहेगा हिंदुस्तान भी

Tuesday, 14 April 2020

देश के जयचन्द

सिपाही के हाथ जब सरेआम काटे जाते हैं
उन विद्रोहक भीड़ में मुझे सब जयचन्द नज़र आते हैं
अस्मत मेरी माटी की कोई बाहरी क्या कुचलेगा
पर आम्भिक जैसे देश द्रोहियों से कब ये देश उभरेगा

ये कोरोना का खेल भी भारत मे यूँ न चला होता
जो आम्भिक औ जयचंदों ने यूँ हमको न छला होता
समझदार को इशारा बहुत है मैं उनको समझाऊं क्या
सूखे वृक्षों की शाखों को भला और हिलाऊ क्या

फिर भी कवि का धर्म यही है सत्य से कभी न मुँह फेरे
कलम धार के तीखे वार से शत्रु को शब्दों से घेरे
जो लगे देश सेवा में नित है उनपर यदि आघात होगा
ऐसे नीच द्रोहियों के सम्मुख खड़ा एक राणा प्रताप होगा

Monday, 30 March 2020

क्यों नही सीखते इतिहास से

क्यों नही सीखते इतिहास से , सिया राम लखन वनवास से
मारीच को रावण ने बुलवाया, जगदम्बा को हरने का बताया
ले आज्ञा महाराज की , युक्ति बनाई सिया को हरषाने की
मारीच ने फिर माया रची , स्वर्ण मृग बन वन में गति करी
देख उसे सिया मन हर्षाया , फौरन प्रभु को पीछे दौड़ाया
लक्ष्मण समझ रहे थे माया , कहा उन्होंने रुको ओ भ्राता
प्रभु भी कुछ भी समझ न पाए , मृग के पीछे वन में आये
प्रभु ने ज्यों ही तीर चलाया , मारीच ने फिर लक्ष्मण चिल्लाया
सुनके सिया का मन घबराया , लक्ष्मण को आदेश थमाया
उठाके अपना तीर कमान , तुरन्त करो वन को प्रस्थान
लक्ष्मण ने फिर तीर लिया , मन को तनिक गम्भीर किया
माता की रक्षा की खातिर , लक्ष्मण ने रेखा खींच दिया
कुछ भी हो बस सब्र रखियेगा , कुटीर से बाहर न पग रखिएगा
माता ने रेखा पार किया , फिर जो भी हुआ इतिहास हुआ
मैं आज तुम्हे बतलाता हूं , इतिहास याद दिलाता हूं
घर में चाहे जो भी करना , दहलीज़ के बाहर न कदम धरना
जब जब वक्त बुरा आया है , कहा अधिक ठहर वह पाया है
मैं फिर से वही दोहराता हूँ , इतिहास को याद कराता हूँ
क्यों नही सीखते इतिहास से , सिया राम लखन वनवास से।।

Sunday, 22 March 2020

माँ का आँचल

कैसी अजब है ये बात कि संताने समझने लगती हैं ,
बुजुर्गो को खुद पर बोझ।
एक  बात समझलो ऐ नादानों,
इस जीवन में हो तुम उनके आलोक।
बुलंदियों को छूने की चाह मन में आई थी,
साथ दिया उस माता ने जो आज तुझे न
भाई थी।
जब काल तेरा आएगा ,
न रोएगी दुनिया तुझ पर।
वही माँ फिर भी तुझे,
अपने आँचल में सुलयेगी।।

                                   
धन्यवाद  (तरुण त्यागी)

Thursday, 12 September 2019

बस यही गाऊँ

मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ
लब खुलें जब भी बस मैं यही गाऊँ

के जो अपना निशान-ओ-लहू बहाते हैं
वे जो जिस्मों को अपने यूँ ही तपाते हैं

वे जो सरहद पर हरपल एक कहानी हैं
किसने ये उनकी ताकत न पहचानी है

वे जो रोके हैं गोली को अपने सीने से
वो वंचित हैं बहनों की राखी-रोली से

उनको मैं नत्मस्तक हो प्रणाम करता हूँ
उनके चरणों मे मैं ये पैगाम रखता हूँ

के न कुर्बानी तुम्हारी यूँही जाया होगी
अगली पीढ़ी से तुम्हारी यादें ताज़ा होंगी

मैं तो हर पल बस यही दोहराऊं
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ

होती होगी तकलीफ उन माताओं को
खलती होगी कमियां भी उनके गांवों को

लहलहाती फसलों और ठंडी छांव को

थोड़ी यादें उनको भी तो झटकाती होंगी
घर की यादें उनको भी तो आती होंगी

फिर भी चलते हैं वो सीने में एक चिंगार लिए
कंधों पर अपने देश की सुरक्षा का भार लिए

लब खुलें जब भी मैं बस यही गाऊँ
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ।