Tuesday, 14 April 2020

देश के जयचन्द

सिपाही के हाथ जब सरेआम काटे जाते हैं
उन विद्रोहक भीड़ में मुझे सब जयचन्द नज़र आते हैं
अस्मत मेरी माटी की कोई बाहरी क्या कुचलेगा
पर आम्भिक जैसे देश द्रोहियों से कब ये देश उभरेगा

ये कोरोना का खेल भी भारत मे यूँ न चला होता
जो आम्भिक औ जयचंदों ने यूँ हमको न छला होता
समझदार को इशारा बहुत है मैं उनको समझाऊं क्या
सूखे वृक्षों की शाखों को भला और हिलाऊ क्या

फिर भी कवि का धर्म यही है सत्य से कभी न मुँह फेरे
कलम धार के तीखे वार से शत्रु को शब्दों से घेरे
जो लगे देश सेवा में नित है उनपर यदि आघात होगा
ऐसे नीच द्रोहियों के सम्मुख खड़ा एक राणा प्रताप होगा

Monday, 30 March 2020

क्यों नही सीखते इतिहास से

क्यों नही सीखते इतिहास से , सिया राम लखन वनवास से
मारीच को रावण ने बुलवाया, जगदम्बा को हरने का बताया
ले आज्ञा महाराज की , युक्ति बनाई सिया को हरषाने की
मारीच ने फिर माया रची , स्वर्ण मृग बन वन में गति करी
देख उसे सिया मन हर्षाया , फौरन प्रभु को पीछे दौड़ाया
लक्ष्मण समझ रहे थे माया , कहा उन्होंने रुको ओ भ्राता
प्रभु भी कुछ भी समझ न पाए , मृग के पीछे वन में आये
प्रभु ने ज्यों ही तीर चलाया , मारीच ने फिर लक्ष्मण चिल्लाया
सुनके सिया का मन घबराया , लक्ष्मण को आदेश थमाया
उठाके अपना तीर कमान , तुरन्त करो वन को प्रस्थान
लक्ष्मण ने फिर तीर लिया , मन को तनिक गम्भीर किया
माता की रक्षा की खातिर , लक्ष्मण ने रेखा खींच दिया
कुछ भी हो बस सब्र रखियेगा , कुटीर से बाहर न पग रखिएगा
माता ने रेखा पार किया , फिर जो भी हुआ इतिहास हुआ
मैं आज तुम्हे बतलाता हूं , इतिहास याद दिलाता हूं
घर में चाहे जो भी करना , दहलीज़ के बाहर न कदम धरना
जब जब वक्त बुरा आया है , कहा अधिक ठहर वह पाया है
मैं फिर से वही दोहराता हूँ , इतिहास को याद कराता हूँ
क्यों नही सीखते इतिहास से , सिया राम लखन वनवास से।।

Sunday, 22 March 2020

माँ का आँचल

कैसी अजब है ये बात कि संताने समझने लगती हैं ,
बुजुर्गो को खुद पर बोझ।
एक  बात समझलो ऐ नादानों,
इस जीवन में हो तुम उनके आलोक।
बुलंदियों को छूने की चाह मन में आई थी,
साथ दिया उस माता ने जो आज तुझे न
भाई थी।
जब काल तेरा आएगा ,
न रोएगी दुनिया तुझ पर।
वही माँ फिर भी तुझे,
अपने आँचल में सुलयेगी।।

                                   
धन्यवाद  (तरुण त्यागी)

Thursday, 12 September 2019

बस यही गाऊँ

मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ
लब खुलें जब भी बस मैं यही गाऊँ

के जो अपना निशान-ओ-लहू बहाते हैं
वे जो जिस्मों को अपने यूँ ही तपाते हैं

वे जो सरहद पर हरपल एक कहानी हैं
किसने ये उनकी ताकत न पहचानी है

वे जो रोके हैं गोली को अपने सीने से
वो वंचित हैं बहनों की राखी-रोली से

उनको मैं नत्मस्तक हो प्रणाम करता हूँ
उनके चरणों मे मैं ये पैगाम रखता हूँ

के न कुर्बानी तुम्हारी यूँही जाया होगी
अगली पीढ़ी से तुम्हारी यादें ताज़ा होंगी

मैं तो हर पल बस यही दोहराऊं
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ

होती होगी तकलीफ उन माताओं को
खलती होगी कमियां भी उनके गांवों को

लहलहाती फसलों और ठंडी छांव को

थोड़ी यादें उनको भी तो झटकाती होंगी
घर की यादें उनको भी तो आती होंगी

फिर भी चलते हैं वो सीने में एक चिंगार लिए
कंधों पर अपने देश की सुरक्षा का भार लिए

लब खुलें जब भी मैं बस यही गाऊँ
मुल्क से ज़्यादा मैं किसे क्या चाहूँ।

Wednesday, 27 February 2019

जन नायक

आतंकियों के भारत माँ पर
घातक अनेक प्रहार हुए ,
कल तक सत्ता के थे
मौन सभी दरबार रहे,
आज मिला है शेर हमें ,
जो सीधे प्रतिकार करे,
हमलावर के घर में घुसकर
जड़ से ही संहार कर।।

आओ मिलकर विजय करे
इस भारत माँ के सेवक को
अपना कल सौंपे उसको ,
जो आज जगा है रातों को।।

हाँ हाँ समझे बिल्कुल ठीक तुम,
मैं बात कर रहा हूँ मोदी की,
सक्षम बनाया भारत को ,
और खोली पाक की धोती भी।।

एक बार फिर पूरा भारत
एक गूंज में हुंकार भरे,
एक सूत्र में बंधे देश
फिर मोदी का आह्वान करे।

वचन दिया था उसने कि
वो देश नही रुकने देगा
वचन दिया था उसने कि
वो देश नहीं झुकने देगा,
वचन दिया था उसने कि
वो देश नही मिटने देगा,

वचन किया है पूर्ण आज मेरे
इस भारत भू के नायक ने,
नहीं तोड़ा विश्वास हमारा,
उस जन ,गन, मन के नायक ने।।

मैं शब्दों की धारा से उसे
आज सलामी देता हूँ,
इन कलम पंक्तियों से मैं उनको
जन मन की वाणी देता हूँ।।।

                                                धन्यवाद
                                             "तरुण त्यागी"

Thursday, 15 November 2018

हुंकार

हुंकार रहा है भूतल पर
हुंकार रहा है जल में भी
हुंकार रहा हर दिशा क्षितिज में
हुंकार रहा है नभ में भी

खोई गरिमा पाने को
सबसे सक्षम बन जाने को
तप कर सोना बन जाने को
सोने की चिड़िया कहलाने को
फिर विश्वगुरु बन जाने को
सबसे महान कहलाने को

दिन रात तपाया खुद को है
दिन रात जलाया खुद को है
महनत से सींचा हर जन ने
दिन रात चलाया खुद को है

अर्थव्यवस्था में इसकी
सबसे ऊंची छलांग पड़ी
सैन्य और शौर्य में इसने
सीखने वालों की प्यास भरी
और बात करें तकनीकी तो
नभ में सफल हुंकार भरी
विकास और कौशल में इसने
शेरों जैसी दहाड़ भरी
और संयुक्तता सिखलाने को
स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की नींव धरी

हुंकार रहा है भूतल पर
हुंकार रहा है जल में भी
हुंकार रहा हर दिशा क्षितिज में
हुंकार रहा है नभ में भी।।

            
                                 धन्यवाद
                              "तरुण त्यागी"

Saturday, 21 July 2018

फरियाद

कुछ अलग अंदाज था
जो वक्त की न की कदर
आज बैठा हूँ अकेले
खाये ठोकर इस कदर

सर पकड़कर रो तड़पकर
बैठा हूँ मैं अब इसकदर
जैसे मांझी को न आये
साहिल-ऐ-कश्ती नज़र

अब एक फरियाद मेरी
सुनले मालिक आखरी
दे मुझे तू हौसला बस
यही फरियाद है आखरी

तेरा साया साथ हो तो
वो मुकाम मिल जाएगा
जग में कर सके न जिसकी
कोई भी बराबरी

साथ हो कोई मेरे
अब न है इसकी कामना
मेरे मालिक तू ही अब
बस मेरा हाथ थामना

तेरे साये में रहूँ
जब तक  भी देह में प्राण हैं
तेरी रहमतों से तो मालिक
पाषाण में भी प्राण हैं

है वचन तुझसे मेरा
हर कर्म करूँगा स्तय से
न भी हो कोई साथ मेरे
तब भी लड़ूंगा असत्य से

करूँगा अब हर कर्म को
मैं सच्चे निष्ठा भाव से
डिगेंगे न अब पग मेरे
सद्भाव से सद्मार्ग से।।
 
                                                   धन्यवाद
                                                ' तरुण त्यागी '