Saturday, 25 July 2020

कारगिल विजय दिवस

ये पंक्तियां उन वीरों की पूजा के लिए  है , जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।।

                  " कारगिल विजय दिवस"

झुकालो आज शीश अपने , तुम गर्व के एहसास से

शहीदों को दो सलामी , तुम देश प्रेम के एहसास से

नम आंखें हो तुम्हारी , खुशी और श्रद्धा के भाव से

दिन आज वही, जिस दिन लड़े वे अपनी अंतिम सांस  से

मिली विजय एक बार फिर उनके शौर्य और साहस से

फिर एक बार जीत गए हम अपने पड़ोसी सांप से

झुकालो आज शीश अपने , तुम गर्व के एहसास से

शहीदों को दो सलामी , तुम देश प्रेम के एहसास से

दफन हुई जो ज़िंदगियाँ उन बर्फीली सफेद कपास में

अमर हुई वे समस्त जीवन , जन - मन के विश्वास में

याद रखेंगे विजय दिवस को विजय पर्व के एहसास से

झुकालो आज शीश अपने , तुम गर्व के एहसास से

शहीदों को दो सलामी, देश प्रेम के एहसास से।।


Saturday, 4 July 2020

संघर्ष वीर

हर बात में आंसू बहाये फिरते हो
क्यों नहीं मुसीबतों से डटकर लड़ते हो
क्या सोच रहे कि कौन आएगा मदद को
क्यों नहीं करते हो तुम सुद्रढ़ स्वयं को

है वीर वही जो हर बाधा से लड़ जाए
संघर्ष करे और बाधाओं से तर जाए
ये धरा भी स्वयं उनकी कायल है
जो लड़ते हैं भले हुए घायल हैं

अरे उठो वीर तुम अब खुद को पहचानो
हर विकट परिस्तिथि से लड़ने की ठानो
एक बार तुम कठोर करो तो मन को
और करो फौलाद तुम स्वयं के तन को

जो ठान लिया की तुझे पार है जाना 
फिर रोक नहीं पाएगा तुझे ज़माना
कर अथक प्रयास भले हो ही विफल तू
एक दिन तो हो ही जाएगा सफल तू

Monday, 15 June 2020

"न रख बैर जीवन से प्राणी"

न रख बैर जीवन से प्राणी 
ब्रह्मा ने बड़ी उम्मीदों से बनाया है
माँ की 9 माह की पीड़ा से तू जन्मा
और पिता ने तुझपे अपना सब कुछ लुटाया है
आत्म चिंतन आत्म मंथन हैं जीने के साधन
आत्मदाह से कब किसने उपचार पाया है
जो मेहनत से सफलताओं का शिखर बनाया था
उन सफलताओं पर भी आज प्रश्न चिह्न लगाया है
शोक जताता है ये संसार जो भी वो सब दिखावा है
पर पीर उन माँ बाप की कब कौन समझ पाया है
न रख बैर जीवन से प्राणी 
माँ ने तुझपे अपना जीवन लुटाया है
वो न सह सकेगी जो जानेगी सत्य
तुझसे अधिक कब उसको संसार भाया है

तरुण त्यागी

Saturday, 6 June 2020

"गीत नहीं झनकार के"

गीत नहीं झनकार के न गौरी के श्रृंगार के
गीत नहीं मल्हार के न बासन्ति प्यार के
गीत हैं ये हुंकार के सैनिक की ललकार के
गीत हैं ये दुलार के माँ भारती के उपकार के

गीत तुम्हें जो सुनने हैं वो मैं नहीं सुना सकता हूँ
प्रेम मिलन के गीत तुम्हें हरगिज़ भी नहीं सुना सकता हूँ
कलम जो हाथों में है उसको तलवार बनाये फिरता हूँ
माँ की यशगाथा से भिन्न कुछ भी नहीं सुना सकता हूँ

मैं कविता लेखन करता हूँ भारत माँ की ममता का
मैं कविता लेखन करता हूँ इसके लालों की क्षमता का
बर्फीली चौटी पर भी जो लहू आग से खौलेगा
उन सिंहों की तारीफों में ये तरुण सदा ही बोलेगा

प्रेम अगर करना ही है तो प्रेम वतन से कर लेना
भारत माँ की सेवा में तुम ये जीवन अर्पण कर देना
जीवन के अंतिम क्षण तक भी कभी मलाल नहीं होगा
और तुम्हारी नीयत पर भी कभी कोई सवाल नहीं होगा

राष्ट्रभक्त हूँ राष्ट्रहित की बात बताने निकला हूँ
माँ भारती के उपकारों का कुछ मौल चुकाने निकला हूँ
सोये रक्त में फिरसे मैं  संचार कराने निकला हूँ
हर भारतीय की रग रग में मैं राष्ट्र बसाने निकल हूँ


Friday, 29 May 2020

मायूस चेहरे

सभी मायूस हैं और सभी व्यथित से चेहरे हैं
मानो आज सबके ऊपर यमदूतों के पहरे हैं
अभी तक हमने किये आघात थे पंचभूतों पर
पर अनभिज्ञ थे कि प्रकृति के प्रतिकार गहरे हैं

अभी भी मानलो सत्य करो बदलाव जीने का
सँजोलो प्रकृति के घटकों को करो संचार जीवन का
जो न सम्भले अब भी इन सब से सीखकर कोई
तो भले खोजलो मंगल ही मिलेगा अंश मात्र जीवन का

कहीं वन में अनल है और कहीं भूचाल है जल में
मिटादि कितनी ही सम्पदा बस एक ही पल में
एक महामारी से तो हम अभी तक लड़ नहीं पाए
नई हो रही समस्याएं खड़ी हर क्षण हर पल में


Tuesday, 19 May 2020

पृथ्वीराज चौहान

हिंसा का खेल हम कभी खेला नहीं करते थे
गौरी जैसे शत्रु को भी जीवित छोड़ दिया करते थे
100 भूलें तो क्षमा कृष्ण ने शिशुपाल की थी 
और 17 बार चौहान ने गौरी को प्राणों की भिक्षा दी थी

पर इतिहास साक्षी है कभी छल से कौन बच पाया है
यहां वीरता पर हर बारी अपनों ने घात लगाया है
फौड चौहान की आंखें गौरी बड़ा हर्षाया था
पर चौहान की हिम्मत को वो अब तक तोड़ न पाया था

थे धनुरश्रेष्ठ चौहान यह किसी से कहां छिपा था
गौरी ने अपनी मृत्यु को आमन्त्रित स्वयं किया था
ज्यों ही गौरी ने बोला करतब दिखाओ चौहान
शब्द भेदी बाण से चौहान ने भेद दियो सुलतान

Saturday, 16 May 2020

टिक टॉक के बीमार

कोई सोलह वर्ष की आयु में कुछ सपने सजाये बैठे हैं
फौजी बनकर सरहद पर जाने की आस लगाये बैठे हैं
जी तोड़ कोशिश महनत करके वे लोहे से तैयार हैं
वहीं एक और कुछ नौजवान  टिक टॉक से बीमार हैं

कोरोना से तो लड़ ही लेंगे इसमें कोई भेद नहीं
पर नस्लों को डूबे देखूं तो कैसे कहदूँ मुझे खेद नहीं
खेद भी है और डर भी भीतर के अब भी जो ये ना जागे
तो इनका भविष्य बनाने को क्यों कोई इनके पीछे भागे

जन नायक कहते हैं हमको आत्मनिर्भर बनना होगा
पर मैं  कहता हूं पहले राष्ट्र को समझदार बनना होगा
कोई आकर सही गलत का भेद हमें क्यों बतलाये
क्यों न स्वयं नव पीढ़ी भारत को उचित मार्ग पर ले जाये

कला और कौशल दोनो का मैं भी करता सम्मान हूँ
पर टिक टॉक वाली कौम से मैं थोड़ा हैरान हूँ
है लग्न तुममे गाने की या अभिनय का है कौशल
तो टिक टॉक से बाहर आकर करो अपना उद्देश्य सफल